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कच्चे तेल, कमजोर रुपये और वैश्विक तनाव से बाजार में बढ़ी बेचैनी, निवेशकों के लिए क्या है सही रणनीति?

भारतीय शेयर बाजार में एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल बनता दिखाई दे रहा है।

बाजार विशेषज्ञ और सेंस एंड सिंप्लिसिटी के सीईओ सुनील सुब्रमण्यम का मानना है कि मौजूदा समय में बाजार की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा संकेतक कच्चे तेल की कीमतें बन गई हैं। उनके मुताबिक, भू-राजनीतिक तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंचा, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ी। हालांकि कीमतों में बाद में कुछ नरमी आई, लेकिन मध्य-पूर्व में जारी तनाव और तेल आपूर्ति से जुड़े जोखिम अभी भी बाजार के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं।

सुनील सुब्रमण्यम के अनुसार, ईरान, अमेरिका, इजरायल, सऊदी अरब और यमन से जुड़े घटनाक्रमों ने तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। उनका कहना है कि बाजार को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि युद्ध कब खत्म होगा और इसका तेल आपूर्ति पर कितना असर पड़ेगा। जब तक इस मोर्चे पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर दिखाई देगा।

उन्होंने कहा कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली इस समय बाजार की सबसे बड़ी चिंता नहीं है। असली बदलाव घरेलू निवेशकों के व्यवहार में देखने को मिल रहा है। संस्थागत घरेलू निवेशक (DII) फिलहाल कंपनियों के तिमाही नतीजों का इंतजार करते हुए सतर्क रुख अपना रहे हैं, जबकि रिटेल और हाई नेटवर्थ निवेशकों की तेजी से होने वाली खरीद-बिक्री स्मॉल और मिडकैप शेयरों में ज्यादा उतार-चढ़ाव पैदा कर रही है। यही वजह है कि बाजार में अस्थिरता पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है।

विशेषज्ञों ने खाद्य महंगाई को भी एक बड़ा जोखिम बताया। उनका कहना है कि इस बार मानसून की प्रगति बेहतर जरूर हुई है, लेकिन कई प्रमुख फसलों की बुआई पिछले साल के मुकाबले कम रही है। खासकर दालों, सोयाबीन, मूंगफली और कपास जैसी फसलों में कमी भविष्य में खाद्य महंगाई बढ़ा सकती है। यदि ऐसा होता है तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर ब्याज दरों को लेकर दबाव बढ़ सकता है, जिससे ब्याज संवेदनशील सेक्टरों पर असर पड़ सकता है।

रुपये में लगातार कमजोरी भी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। उनका कहना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण आयात बिल बढ़ता है और इसका सीधा दबाव रुपये पर पड़ता है। कमजोर रुपया महंगाई बढ़ाने के साथ विदेशी निवेशकों के रिटर्न को भी प्रभावित करता है। हालांकि आईटी और फार्मा जैसी निर्यात आधारित कंपनियों को इससे कुछ फायदा मिल सकता है, लेकिन समग्र बाजार के लिए यह सकारात्मक संकेत नहीं माना जा सकता।

निवेश रणनीति पर सुनील सुब्रमण्यम ने कहा कि मौजूदा माहौल में घबराकर नया पोर्टफोलियो बनाने की बजाय पहले से बने पोर्टफोलियो को संतुलित करना अधिक उचित होगा। उनका मानना है कि बैंकिंग एवं वित्तीय सेवा (BFSI) और फार्मा सेक्टर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन सेक्टरों में निकट अवधि की अस्थिरता से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए निवेश धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से करना बेहतर रहेगा।

उन्होंने आईटी सेक्टर को वैल्यू के नजरिए से आकर्षक जरूर बताया, लेकिन निकट भविष्य में तेज ग्रोथ की उम्मीद कम जताई। वहीं रक्षा (Defence) और रेलवे जैसे उन सेक्टरों में, जहां पिछले कुछ वर्षों में तेज रैली देखने को मिली है, उन्होंने जरूरत से ज्यादा एक्सपोजर कम करने की सलाह दी। उनका कहना है कि इन क्षेत्रों की लंबी अवधि की संभावनाएं मजबूत हैं, लेकिन मौजूदा ऊंचे वैल्यूएशन के चलते मुनाफावसूली की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

सुनील सुब्रमण्यम का मानना है कि फिलहाल बाजार पूरी तरह घबराहट की स्थिति में नहीं पहुंचा है, लेकिन वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की चाल, मानसून और कंपनियों के तिमाही नतीजे आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करेंगे। ऐसे में निवेशकों को जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय विविधीकरण, चरणबद्ध निवेश और लंबी अवधि की रणनीति पर ध्यान देना चाहिए।


(शेयर मंथन, 29 जुलाई 2026)

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