भारतीय शेयर बाजार में लगातार नए आईपीओ आने का सिलसिला जारी है।
हर सप्ताह कई कंपनियां बाजार में दस्तक दे रही हैं, जिनमें बड़ी संख्या स्मॉलकैप और माइक्रोकैप श्रेणी में शामिल हो सकती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या लगातार आईपीओ आने से सेकेंडरी मार्केट की लिक्विडिटी पर दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल ऐसा बड़ा खतरा दिखाई नहीं दे रहा है।
इसकी एक बड़ी वजह बाजार में उपलब्ध लिक्विडिटी को माना जा रहा है। क्रेडिट ग्रोथ, कॉरपोरेट प्रॉफिटेबिलिटी और डिस्पोजेबल इनकम जैसे कई स्रोतों से बाजार में पैसा आ रहा है। इसके अलावा आईपीओ की प्रक्रिया भी पहले की तुलना में तेज हो गई है। अलॉटमेंट के बाद पैसा जल्दी निवेशकों के पास वापस आ जाता है, जिससे वह दोबारा बाजार में लगाया जा सकता है।
बड़े आईपीओ को लेकर भी फिलहाल बहुत ज्यादा चिंता नहीं जताई गई है। चर्चा में एलआईसी के करीब 31,000 करोड़ रुपये के ऑफर फॉर सेल का उदाहरण दिया गया, जिसे बाजार ने बिना बड़े व्यवधान के पचा लिया। आगे बड़े आईपीओ आने के बावजूद उनका असर केवल उनके आकार से नहीं बल्कि पूरे बाजार के आकार और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में आईपीओ की संख्या बढ़ना बाजार के लिए सामान्य गतिविधि के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि निवेशकों को हर आईपीओ में सिर्फ तेजी की उम्मीद में पैसा लगाने से बचना चाहिए।
(शेयर मंथन, 17 अगस्त 2026)
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