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क्या डेरिवेटिव पर कम निर्भरता NSE के लिए नया ग्रोथ इंजन बन सकती है?

NSE के IPO के बीच सबसे अहम सवालों में से एक यह है कि रेगुलेटरी बदलावों के बाद एक्सचेंज का डेरिवेटिव कारोबार किस तरह आगे बढ़ेगा।

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार का कहना है कि रेगुलेटरी बदलावों के तहत एक्सचेंज पर वीकली ऑप्शंस की एक्सपायरी को लेकर भी बदलाव हुआ है। आशीष चौहान ने बताया कि पहले पांच एक्सपायरी डेज थे, जिन्हें बदलकर एक कर दिया गया। इसके बावजूद NSE ने नए प्रोडक्ट्स और अन्य बिजनेस सेगमेंट्स पर ध्यान बढ़ाया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट, इलेक्ट्रिसिटी फ्यूचर्स, कोल स्पॉट और बॉन्ड इंडेक्स फ्यूचर्स जैसे प्रोडक्ट्स शामिल हैं।

कंपनी के अनुसार डेटा बिजनेस, इंडेक्स लाइसेंसिंग, टर्मिनल सर्विसेज और क्लियरिंग एवं सेटलमेंट से जुड़े रेवेन्यू में भी बढ़ोतरी हुई है। इससे NSE के रेवेन्यू सोर्स को धीरे-धीरे विविध बनाने की कोशिश दिखाई देती है। हालांकि बातचीत में यह भी स्पष्ट किया गया कि इक्विटी डेरिवेटिव अभी भी कंपनी के रेवेन्यू का प्रमुख स्रोत है। इसलिए डाइवर्सिफिकेशन की प्रक्रिया अभी पूरी तरह से डेरिवेटिव पर निर्भरता खत्म होने का संकेत नहीं है।

आगे NSE के लिए चुनौती यह होगी कि नए प्रोडक्ट्स और गैर-डेरिवेटिव कारोबार से मिलने वाला रेवेन्यू कितनी तेजी से बढ़ता है। कंपनी की ओर से नए सेगमेंट पर काम करने की बात कही गई है, लेकिन इनसे भविष्य में कुल कारोबार में कितनी हिस्सेदारी बनेगी, इसका आकलन आने वाले समय के प्रदर्शन से ही किया जा सकेगा।


(शेयर मंथन, 24 सितंबर 2026)

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