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मिड कैप-स्माल कैप शेयरों में गिरावट के बीच निवेशकों को क्या करना चाहिए?

मिड कैप और स्माल कैप शेयरों में हाल की गिरावट को लेकर निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह घबराहट (पैनिक) है या हालात अब भी नियंत्रण में हैं। 

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि मौजूदा हालात को पूरी तरह नकारात्मक कहना जल्दबाज़ी होगी। निफ्टी मिड कैप के लिए 59,000 का स्तर बेहद अहम है। जब तक यह स्तर नहीं टूटता, तब तक बड़े क्रैक या गहरे करेक्शन की बात करना सही नहीं है। अभी भी मिड कैप का ओवरऑल स्ट्रक्चर नए हाई की ओर इशारा करता है। अगर कोई निवेशक S&P 500 जैसे विकसित बाजारों के लंबे समय के वीकली चार्ट देखे, तो समझ आएगा कि अच्छे बाजार भी बीच-बीच में रुकावटों और रोडब्लॉक्स से गुजरते हैं। नतीजों का सीजन, खासकर फरवरी में आने वाले रिजल्ट्स, मिड और स्माल कैप की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। संभव है कि पहले एक सीमित या नॉमिनल रैली आए और उसके बाद एक-दो क्वार्टर में तेज और फायरि रैली देखने को मिले। यानी अभी की कमजोरी को दीर्घकालिक ट्रेंड का अंत नहीं, बल्कि एक ठहराव या कंसोलिडेशन के रूप में देखना ज्यादा व्यावहारिक होगा। 

बड़ी गिरावट की आशंका सीमित

बेशक, जियोपॉलिटिकल टेंशन एक बड़ा अनिश्चित कारक बना हुआ है। अगर वैश्विक स्तर पर हालात बिगड़ते हैं, जैसे यूक्रेन युद्ध का तेज होना, चीन-ताइवान तनाव या मध्य-पूर्व में गड़बड़ी तो बाजार पर इसका असर पड़ सकता है। इतिहास बताता है कि जो देश सीधे युद्ध में शामिल नहीं होते, वहां बाजारों में आमतौर पर 5-7% तक का सीमित करेक्शन देखने को मिलता है, जबकि युद्धग्रस्त क्षेत्रों में 30-40% तक की गिरावट संभव है। भारत का रुख अब तक संतुलित और कूटनीतिक रहा है, इसलिए बड़े झटके की आशंका फिलहाल कम लगती है। 

स्माल कैप इंडेक्स की बात करें तो हाल की गिरावट जरूर तीखी रही है, लेकिन 17,000 का स्तर एक मजबूत सपोर्ट की तरह उभरता दिखता है। दिलचस्प बात यह है कि पूरे 2024 में स्माल कैप इंडेक्स ने लगभग कोई रिटर्न नहीं दिया, जबकि कंपनियों की अर्निंग्स लगातार बढ़ती रही हैं। इसका मतलब यह है कि वैल्यूएशन के लिहाज से बाजार पहले की तुलना में ज्यादा संतुलित और मजबूत हुआ है। अगर हालात बहुत बिगड़ते हैं और डाउनवर्ड चैनल फॉलो होता है, तो 16,000-16,300 जैसे स्तर भी दिख सकते हैं, लेकिन यह तभी होगा जब वैश्विक स्तर पर हालात बेहद खराब हों। फिलहाल बाजार को अमेरिका-भारत ट्रेड डील में अटकाव, टैरिफ का दबाव और एक्सपोर्ट पर असर जैसी नकारात्मक बातें पहले से पता हैं, और ये काफी हद तक कीमतों में शामिल भी हो चुकी हैं। दूसरी ओर, कॉरपोरेट प्रॉफिटेबिलिटी में सुधार, क्रेडिट ग्रोथ और ब्याज दरों में संभावित नरमी जैसे पॉजिटिव फैक्टर भी मौजूद हैं।


(शेयर मंथन, 10 जनवरी 2026)

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