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कमजोर नतीजों के बाद क्या रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में बढ़ेगा दबाव?

भारत की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल रिलायंस इंडस्ट्रीज के तिमाही नतीजों ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। 

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि कंपनी के परिणाम उम्मीद से कमजोर रहे हैं और इसका असर आने वाले कारोबारी सत्र में शेयर कीमतों पर देखने को मिल सकता है। क्योंकि रिलायंस का बाजार में बड़ा वेटेज है, इसलिए इसकी कमजोरी का असर पूरे बाजार की दिशा पर भी पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती नकारात्मक प्रतिक्रिया तय है, लेकिन इसके बाद निवेशकों को तकनीकी और आर्थिक दोनों पहलुओं को ध्यान से समझना होगा। तकनीकी विश्लेषण के आधार पर रिलायंस के चार्ट में एक बड़ा “डबल टॉप” पैटर्न बनता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे लंबे पैटर्न का निचला स्तर टूटने पर बाजार में सावधानी बरतना जरूरी हो जाता है क्योंकि उसके बाद शेयर में बड़ी गिरावट या फुल रिट्रेसमेंट की संभावना बनती है। उनका आकलन है कि रिलायंस के लिए 1350 रुपये के आसपास का स्तर बेहद महत्वपूर्ण है। अगर कमजोरी और बढ़ती है तो 1150-1200 रुपये तक के स्तर भी भविष्य में देखने को मिल सकते हैं।

मौजूदा समय में रिलायंस के ऑयल-टू-केमिकल और रिफाइनिंग बिजनेस पर दबाव बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं और इससे रिफाइनिंग मार्जिन प्रभावित हो रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें स्थिर होकर नीचे नहीं आतीं, तब तक इस बिजनेस में दबाव बना रह सकता है। यही वजह है कि बाजार रिलायंस के नतीजों को लेकर फिलहाल उत्साहित नजर नहीं आ रहा। हालांकि लंबी अवधि के नजरिए से विशेषज्ञ रिलायंस को अब भी एक महत्वपूर्ण कंपनी मानते हैं। उनका कहना है कि 1990 के दशक से अब तक रिलायंस ने एक लंबे बुल रन के तीनों चरण शुरुआती उभार, तेज विस्तार और यूफोरिया  पूरे कर लिए हैं। 2020 के बाद कंपनी के शेयर में जो तेज उछाल आया, उसे वे “यूफोरिया फेज” मानते हैं। ऐसे बड़े बुल रन के बाद लंबे समय का कंसोलिडेशन और वैल्यूएशन करेक्शन सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है।

अगर रिलायंस भविष्य में 1150 रुपये के आसपास स्थिर होता है, तो वहां से यह फिर लंबे समय के निवेश के लिए आकर्षक बन सकता है। उनका यह भी कहना है कि रिलायंस खुद को लगातार नए बिजनेस मॉडल में बदल रही है। कंपनी अब सिर्फ तेल और पेट्रोकेमिकल्स तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि डिजिटल, रिटेल, ग्रीन एनर्जी और नए टेक्नोलॉजी सेक्टरों में भी तेजी से विस्तार कर रही है। ऐसे में आने वाले वर्षों में रिलायंस के भीतर से नए बिजनेस और नई ग्रोथ कहानियां निकल सकती हैं।

ऊर्जा क्षेत्र को लेकर भी विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण बात कही। उनका मानना है कि दुनिया में तेल और कोयले का महत्व अभी खत्म होने वाला नहीं है। आज भी वैश्विक ऊर्जा खपत का 85% से अधिक हिस्सा पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों यानी ऑयल और कोल से आता है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि तेल का दौर खत्म हो गया है। हां, आने वाले समय में इसका “पीक यूटिलाइजेशन” यानी अधिकतम उपयोग का दौर आ सकता है क्योंकि दुनिया धीरे-धीरे रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ रही है।

चीन इस बदलाव में दुनिया से काफी आगे निकल चुका है और वहां वैकल्पिक ऊर्जा का विस्तार बहुत तेज़ी से हो रहा है। इसी वजह से यह चर्चा बढ़ रही है कि चीन में ऊर्जा खपत 2027-28 तक अपने शिखर पर पहुंच सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तेल की मांग खत्म हो जाएगी। उनका मानना है कि अगले 20 से 30 वर्षों तक दुनिया की अर्थव्यवस्था तेल और पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर काफी हद तक निर्भर बनी रहेगी। इसलिए रिलायंस जैसी कंपनियों के लिए अवसर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, बल्कि वे बदलते दौर के हिसाब से खुद को नए रूप में ढालने की कोशिश कर रही हैं।

 



(शेयर मंथन, 30 अप्रैल 2026) (आप किसी भी शेयर, म्यूचुअल फंड, कमोडिटी आदि के बारे में जानकारों की सलाह पाना चाहते हैं, तो सवाल भेजने का तरीका बहुत आसान है! बस, हमारे व्हाट्सऐप्प नंबर +911147529834 पर अपने नाम और शहर के नाम के साथ अपना सवाल भेज दें।)

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