के. संदीप नायक
एमडी एवं सीईओ, सेंट्रम फिनवर्स
इस समय भारतीय शेयर बाजार के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक कारक कच्चे तेल की कीमतों का गिरना है। इसके अलावा, निफ्टी के 24,000 के आस-पास रहने पर लगभग 21 गुना पीई (विगत 12 माह) के साथ उचित मूल्यांकन भी बाजार के लिए सकारात्मक है।
दूसरी ओर, एफपीआई की लगातार बिकवाली और कमजोर मॉनसून प्रमुख नकारात्मक कारक हैं। अगले 12 महीनों में मैं भारतीय बाजार को वैश्विक बाजारों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हुए देखता हूँ।
मैंने दिसंबर 2026 तक सेंसेक्स 85,000 और निफ्टी 26,500 के स्तर पर पहुँचने का अनुमान लगाया है। अगले 12 महीनों के लिए मेरा सेंसेक्स लक्ष्य 90,000 और निफ्टी का लक्ष्य 28,000 है। मैं सेंसेक्स को 2028 तक 1 लाख के स्तर पर पहुँचते देखता हूँ।
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए निफ्टी ईपीएस 1,239 रुपये रहनी चाहिए, जो अगले वित्त वर्ष 2027-28 में 1,431 रुपये पर पहुँच सकती है। मुझे लग रहा है कि 2026-27 की पहली छमाही में कॉर्पोरेट आय में वृद्धि 0-10% के दायरे में होगी। वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.6% हो सकती है, जो अगले वित्त वर्ष में बढ़ कर 6.8% पर जा सकती है।
बिजली (पावर), स्वास्थ्य सेवाएँ (हेल्थकेयर), रक्षा (डिफेंस) और कैपिटल मार्केट इन्फ्रा बेहतर प्रदर्शन करने वाले क्षेत्र हो सकते हैं, जबकि आईटी सेवाएँ, कंज्यूमर डिस्क्रीशनरी और एफएमसीजी कमजोर प्रदर्शन कर सकते हैं। अगले 12 महीनों के लिए मेरी प्रमुख पसंद एचएएल, रिलायंस, बीपीसीएल, इटरनल और एचडीएफसी बैंक हैं।
अगले छह महीनों में कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक अर्थव्यवस्था, भारत की जीडीपी वृद्धि दर, तिमाही नतीजे, महँगाई और ब्याज दरें भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारक रहेंगी। अमेरिका-ईरान युद्ध का भारतीय बाजार पर काफी नकारात्मक असर पड़ा है। वहीं, भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2027 में कभी हो सकता है। यदि अगले 3-6 महीनों में ऐसा समझौता होता भी है, तो इसका भारतीय बाजार पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
वैश्विक और घरेलू ब्याज दरों का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की कीमतें किस स्तर पर रहती हैं। यदि कच्चा तेल करीब 70 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहता है, तो महँगाई नियंत्रण में रहेगी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से दरें बढ़ाने की चर्चा कमजोर होगी। इसी तरह, भारत का राजकोषीय घाटा और महँगाई भी नियंत्रण में रहेंगे, जिससे आरबीआई के पास दरों में कटौती की गुंजाइश बनेगी। इसके विपरीत, यदि कच्चे तेल की कीमतें फिर बढ़ती हैं, तो इसका असर भी उलटा होगा।
मुझे लगता है कि वैश्विक एआई बुलबुले में शुरुआती दरारें दिखाई दे रही हैं। यदि एआई बुलबुला फूटता है, तो अमेरिकी बाजार में गिरावट के संक्रमण प्रभाव के कारण इसका भारतीय बाजार पर तत्काल नकारात्मक असर होगा। हालाँकि, मध्यम से लंबी अवधि में इसका असर तटस्थ होना चाहिए, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था घरेलू खपत पर आधारित है।
अगले छह महीनों में कच्चे तेल की कीमतें, फेडरल रिजर्व का ब्याज दरों पर रुख और भू-राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय बाजार को प्रभावित करने वाले प्रमुख वैश्विक कारक होंगे। मेरा मानना है कि अमेरिका में एआई बुलबुला फूटने या कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने की स्थिति में एफपीआई भारतीय बाजार में शुद्ध खरीदार बन सकते हैं। अगले छह महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 91-95 के दायरे में रह सकती है।
कच्चे तेल की कीमतों में 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक के स्तर से गिर कर 70-75 डॉलर के दायरे में आने के बाद मैक्रो आर्थिक माहौल अब अधिक अनुकूल हो गया है, जबकि बाजार का मूल्यांकन (वैल्यूएशन) भी उचित स्तर पर है। पहली तिमाही के नतीजे और मॉनसून की प्रगति निकट अवधि में बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे। ऐसे माहौल में मेरा मानना है कि बुनियादी रूप से मजबूत कंपनियों का चयन करते हुए चरणबद्ध तरीके से निवेश बढ़ाने की रणनीति अपनाना उचित होगा।
(शेयर मंथन, 19 जुलाई 2026)