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एक्सपर्ट से जानें एफआईआई बिकवाली क्यों रुक नहीं रही और आगे क्या संकेत?

एफआईआई (Foreign Institutional Investors) की लगातार बिकवाली को समझने के लिए हमें ग्लोबल और घरेलू दोनों फैक्टर्स को एक साथ देखना होगा।

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार कहते है कि सबसे पहले, जब अमेरिका में बॉन्ड यील्ड 4.4%–4.5% के आसपास पहुंच जाती है, तो वहां निवेश करना ज्यादा सुरक्षित और आकर्षक लगने लगता है। ऐसे में बड़े विदेशी फंड्स अपना पैसा उभरते बाजारों जैसे भारत से निकालकर अमेरिका की तरफ शिफ्ट करने लगते हैं। यह एक सामान्य कैपिटल फ्लो साइकिल है, जिसमें पैसा हमेशा उस जगह जाता है जहां बेहतर रिटर्न और कम जोखिम दिखता है। दूसरा बड़ा कारण रुपए की कमजोरी है। जब भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिरता है, तो एफआईआई के रिटर्न पर डबल असर पड़ता है, एक तो शेयर बाजार में गिरावट और दूसरा करेंसी लॉस। उदाहरण के लिए, अगर उन्होंने भारत में 10% रिटर्न कमाया लेकिन रुपया 5–7% कमजोर हो गया, तो उनका असली (डॉलर में) रिटर्न काफी कम हो जाता है। इसलिए जैसे-जैसे रुपया कमजोर होता है, एफआईआई पर दबाव बढ़ता है कि वे अपना निवेश निकाल लें। यही कारण है कि कभी-कभी यह एक “वicious cycle” बन जाता है, एफआईआई बेचते हैं, रुपया गिरता है, और रुपया गिरने से वे और बेचते हैं।

तीसरा फैक्टर है कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें और जियो-पॉलिटिकल तनाव। अगर युद्ध या तनाव की वजह से तेल महंगा होता है, तो भारत का आयात बिल बढ़ता है, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट और रुपए पर दबाव बढ़ता है। इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ता है। साथ ही, अनिश्चितता (uncertainty) जितनी ज्यादा होती है, बड़े निवेशक उतना ही रिस्क कम करने की कोशिश करते हैं यानी इक्विटी बेचते हैं।

चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है भारत की कॉर्पोरेट कमाई (earnings growth)। पिछले कुछ क्वार्टर से कंपनियों की आय (EPS growth) में खास तेजी नहीं दिखी है। एफआईआई लंबे समय के लिए निवेश करते हैं और उन्हें 15–18% की ग्रोथ चाहिए होती है। अगर यह ग्रोथ 12–13% तक भी गिरती दिखे और उसमें भी अनिश्चितता हो, तो वे नए निवेश से बचते हैं और पुरानी होल्डिंग्स को धीरे-धीरे कम करते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या एफआईआई की बिकवाली की कोई सीमा होती है? तकनीकी रूप से उन्हें कोई रोक नहीं है। वे तब तक बेच सकते हैं जब तक उन्हें बेहतर विकल्प कहीं और मिल रहे हैं या जोखिम ज्यादा लग रहा है। लेकिन व्यवहार में एक “नेचुरल लिमिट” होती है, क्योंकि बहुत ज्यादा बिकवाली से कीमतें नीचे आ जाती हैं और फिर वैल्यूएशन आकर्षक हो जाते हैं। उस समय वही एफआईआई वापस खरीदारी भी शुरू कर सकते हैं।

यह भी समझना जरूरी है कि बाजार सिर्फ एफआईआई से नहीं चलता। भारत में डीआईआई (Domestic Institutional Investors) जैसे म्यूचुअल फंड्स लगातार खरीदारी करते हैं और कई बार एफआईआई की बिकवाली को संतुलित भी करते हैं। लेकिन अगर एफआईआई की बिकवाली बहुत तेज हो जाए और डीआईआई पूरी तरह उसे absorb न कर पाएं, तो बाजार में गिरावट दिखती है।

 



(शेयर मंथन, 30 मार्च 2026) (आप किसी भी शेयर, म्यूचुअल फंड, कमोडिटी आदि के बारे में जानकारों की सलाह पाना चाहते हैं, तो सवाल भेजने का तरीका बहुत आसान है! बस, हमारे व्हाट्सऐप्प नंबर +911147529834 पर अपने नाम और शहर के नाम के साथ अपना सवाल भेज दें।)

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