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आरबीआई (RBI) का यह संकोच तो पुराना है

राजीव रंजन झा : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी सालाना मौद्रिक नीति (monetary policy) में बाजार की उम्मीदों को बड़ा झटका तो नहीं दिया, लेकिन जितनी उम्मीदें लगायी जा रही थीं वे सब पूरी नहीं हो पायीं।
बाजार का एक बड़ा तबका मान रहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हाल की कई अनुकूल बातों के मद्देनजर शायद आरबीआई इस बार अपनी रेपो दर में 0.50% अंक की कटौती कर दे, लेकिन इसके बदले आरबीआई ने 0.25% कटौती करना ही मुनासिब समझा। बाजार उम्मीद लगा रहा था कि रेपो दर के साथ-साथ नकद आरक्षित अनुपात (CRR) में भी कमी होगी। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और एचडीएफसी बैंक जैसे बड़े बैंकों की ओर से भी इसके लिए पुरजोर आग्रह किया जा रहा था। लेकिन आरबीआई ने इस मांग को अनसुना कर दिया।
अगर रेपो दर में 0.25% अंक की कटौती को एक पेड़ा, 0.50% अंक की कटौती को दो पेड़े और साथ में सीआरआर में कटौती को तीसरा पेड़ा माना जाये, तो बाजार आरबीआई से तीन पेड़े माँग रहा था, मिला केवल एक। जाहिर है कि बाजार कुछ नाउम्मीद होगा। आखिर रेपो दर में केवल 0.25% अंक की कटौती के लिए बाजार ने बीते दो-तीन हफ्तों में निफ्टी को 5477 से लेकर 6020 तक नहीं उछाला था ना। बाजार को कुछ ज्यादा चाहिए था, पर नहीं मिला।
उद्योग जगत ने भी अपनी निराशा जता दी है। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) ने अपने बयान में कह दिया है कि रेपो दर में केवल 0.25% अंक की कटौती का यह फैसला उसकी उम्मीदों से पीछे रह गया। सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी कह रहे हैं कि अगर 0.50% अंक की कटौती होती, तो वह अर्थव्यवस्था को तेजी देने के लिहाज से बेहतर होता और उससे निवेशकों का उत्साह बढ़ता।
लेकिन आरबीआई ने तो अपनी पिछली समीक्षा में ही कह दिया था कि आगे उसके पास बेहद कम गुंजाइश बाकी है। इसने एक तरह का स्पष्ट संकेत दिया था कि साल भर में उसके पास 0.50% अंक तक ब्याज दर घटाने की गुंजाइश है।
बेशक, पिछली समीक्षा के बाद से अब तक कई ऐसी बातें हुई हैं, जिनके चलते बाजार ने नयी सालाना नीति से काफी उम्मीदें बाँध लीं। महँगाई दर घटती दिख रही है। दूसरी तरफ सोने और कच्चे तेल के भावों में आयी गिरावट के चलते भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव घटा है। खास कर चालू खाते के घाटे को लेकर स्थिति पहले से सुधरने की उम्मीद बनी है। दूसरी ओर विकास दर में कुछ और कमी आयी है, जिसे सहारा देने की जरूरत दिखती है।
मगर आरबीआई गवर्नर डुव्वुरी सुब्बाराव ने अपने पूरे कार्यकाल में यह दिखाया है कि वे ब्याज दरें घटाने को लेकर बड़े संकोची हैं। मेरी तो राय है कि ब्याज दरों में कटौती का चक्र दो साल पहले ही शुरू हो जाना चाहिए था और रेपो दर को इस समय 7.25% के बदले 5-6% के दायरे में होना चाहिए था। लेकिन यहाँ मेरी राय से कुछ फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है आरबीआई की सोच से, और वह सोच बीते सालों में यही रही है कि ब्याज दरों को घटाने में हद से ज्यादा संकोच बरती जाये। वही सकोच हमें एक बार फिर आरबीआई के फैसले में दिखी है। Rajeev Ranjan Jha 
(शेयर मंथन, 03 मई 2013)

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