अयोध्या मामले में शीर्ष अदालत का ऐतिहासिक फैसला, हिंदू पक्ष को मिली विवादित जमीन

अयोध्या भूमि विवाद मामले में 40 दिन तक रोजाना सुनवाई के बाद आखिरकार उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने शनिवार 09 नवंबर को अपना फैसला सुना दिया।

अदालत के फैसले के अनुसार विवादित जमीन केंद्र सरकार को दी जायेगी। केंद्र सरकार को तीन महीनों में एक ट्रस्ट का गठन करना होगा, जो मंदिर के निर्माण की निगरानी और प्रबंधन करेगा। यानी अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया है। वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में एक प्रमुख स्थान पर मस्जिद के लिए पाँच एकड़ जमीन दी जायेगी। शिया वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के दावों को अदालत ने खारिज कर दिया है। मगर केंद्र द्वारा बनाये जाने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को शामिल किया जाये या नहीं ये फैसला केंद्र सरकार करेगी।
दशकों तक चले इस मामले में देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर की पाँच न्यायाधीशों वाली संवैधानिक पीठ ने फैसला सुनाया। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन को रामलला, सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा के बीच बराबर हिस्सों में बाँटने का फैसला सुनाया था। मगर तीनों पक्षों ने इस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था। फैसले से पहले उत्तर प्रदेश सहित दिल्ली-एनसीआर और महाराष्ट्र में सुरक्षा से कड़े इंतेजाम किये गये थे।
फैसले पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संयम बनाये रखने और इस फैसले को हार-जीत की तरह न देखने की बात कही है। वहीं प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया था कि 'अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आयेगा, वो किसी की हार-जीत नहीं होगा। देशवासियों से मेरी अपील है कि हम सब की यह प्राथमिकता रहे कि ये फैसला भारत की शांति, एकता और सद्भावना की महान परंपरा को और बल दे।' फैसला आने के बाद उन्होंने कहा कि रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है।
इसके अलावा राहुल गाँधी सहित अन्य नेताओं ने भी देशवासियों से शांति और भाईचारे की अपील की है। (शेयर मंथन, 09 नवंबर 2019)

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