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डॉलर को कमजोर कर अमेरिका का व्यापार घाटा नियंत्रित तो नहीं करना चाहते ट्रंप?

दिन बीतने के साथ साथ रुपया मजबूत और डॉलर कमजोर हो रहा है। 6 मुद्राओं (स्विस फ्रैंक, यूरो, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड, कैनेडा का डॉलर, और स्वीडेन का क्रोना) वाला डॉलर सूचकांक 100 के स्तर के नीचे फिसल कर 3 साल के निचले स्तरों पर पहुँच गया है, जबकि इसी साल 13 जनवरी को ये 110 तक पहुँच गया था। लेकिन तब से जो गिरावट शुरू हुई है वो थमने का नाम नहीं ले रही।

हालात और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को देखते हुए एक सवाल उठता है कि डॉलर वाकई गिर रहा है या फिर गिराया जा रहा है? अगर गिराया जा रहा है तो क्या डॉनल्ड ट्रंप खुद ऐसा कर रहे हैं? अगर हाँ, तो क्यों? ट्रंप क्यों चाहेंगे डॉलर कमजोर हो? ऐसा करने से आखिर उन्हें क्या फायदा? अब तक तो हम यही जानते थे कि डॉलर जितना मजबूत होगा अमेरिका को उतना ही फायदा होगा। लेकिन ये उल्टी गंगा क्यों बहने लगी है? चलिये समझने की कोशिश करते हैं।

ट्रंप क्यों चाहेंगे डॉलर गिरे?

जानकारों के मुताबिक ट्रंप एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश में हैं। वो चाहते हैं कि टैरिफ के कारण दुनिया उनके सामने झुकी नजर आए, जो हो भी रहा है। आज 60 से भी ज्यादा देश ट्रंप और उनके प्रतिनिधियों से टैरिफ के मुद्दे पर बात या तो कर रहे हैं या फिर करना चाहते हैं। वहीं, ट्रंप भी ये जानते हैं कि टैरिफ से अमेरिका में चीजें महँगी होंगी, यानी महँगाई बढ़ेगी। लिहाजा अगर डॉलर कमजोर होगा तो अमेरिका में चीजें सस्ती होंगी। यानी वो डॉलर को महँगाई के खिलाफ एक कुशन की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। अगर डॉलर कमजोर होगा तो अमेरिका का निर्यात बढ़ेगा, व्यापार घाटा कम होगा और आयात महँगा होने से घरेलू विनिर्माण बढ़ेगा और घरेलू सामान ज्यादा बिकेंगे।

इसके विपरीत, अगर डॉलर मजबूत होता है तो अमेरिका के लिए दूसरे देशों से आयात सस्ता होता है और खुद उसके लिए अपना माल दूसरे देशों में बेचना महँगा बन जाता है। इससे अमेरिका का आयात बढ़ता है जबकि निर्यात घट जाता है और उसे व्यापार घाटा होता है। आँकड़ों की मानें तो पिछले साल दिसंबर में अमेरिका का व्यापार घाटा 98.06 अरब डॉलर का था। वहीं, 2024 में ये 918.4 अरब डॉलर का था। बड़ी बात ये है कि 2023 के मुकाबले 2024 में अमेरिका का व्यापार घाटा 17% से बढ़ गया था।

अमेरिका का आयात और निर्यात (अरब डॉलर)

महीना एक्सपोर्ट इंपोर्ट

अगस्त 2024 272.57 344.02

सितंबर 2024 269.81 354.82

अक्टूबर 2024 266.21 339.94

नवंबर 2024 273.52 351.75

दिसंबर 2024 266.52 364.58

जनवरी 2025 270.51 401.16

फरवरी 2025 278.46 401.12 

अमेरिका का व्यापार घाटा (बिलियन डॉलर)

अगस्त 2024 -71.45

सितंबर 2024 -85.01

अक्टूबर 2024 -73.73

नवंबर 2024 -78.24

दिसंबर 2024 -98.06

जनवरी 2025 -130.65

फरवरी 2025 -122.66

अमेरिका का बाहरी कर्ज (करोड़ डॉलर)

Q1’23 25.0

Q2’23 25.1

Q3’23 25.6

Q4’23 26.0

Q1’24 26.5

Q2’24 26.9

Q3’24 25.8

Q4’24 27.6

गिरावट की राह कितनी आसान?

ट्रंप चाहते है कि डॉलर गिरे। ऐसा हो भी रहा है। डॉलर कमजोर हो रहा है। लेकिन सवाल ये है कि ट्रंप का ये कदम उनके लिए कितना आसान होने वाला है। जानकार बताते हैं कि डॉलर की असल लगाम ट्रंप नहीं बाजार के हाथों में है। फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट होने के कारण डॉलर का भाव बाजार तय करता है।

अगर निवेशकों को लगता है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, दरें ऊँची हैं जैसे संकेत मिले तो वो डॉलर में निवेश करना शुरू कर देंगे। ऐसा हुआ तो डॉलर की माँग और दाम दोनों बढ़ जायेंगे। यानी डॉलर मजबूत होना शुरू हो जायेगा, जैसा हमने कुछ महीनों पहले देखा भी था। डॉलर इंडेक्स 3 सालों की ऊँचाई पर पहुँच गया था। हालाँकि डॉनल्ड ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका का निर्यात बढ़े और आयात घटे, ताकि व्यापार घाटा कम हो। ऐसा करने के लिए डॉलर का कमजोर होना जरूरी है। डॉलर कमजोर हुआ तो अमेरिका में उसके बनाये सामान उसी के देश में सस्ते हो जायेंगे और आयात भी कम हो जायेगा। लेकिन ये राह इतनी आसान नहीं है। 

1) अगर निवेशकों के लिए अमेरिका में निवेश करना आकर्षक बना रहेगा तो डॉलर कमजोर नहीं मजबूत होगा। वहीं, अगर ट्रंप चाहते हैं कि डॉलर कमजोर हो तो सबसे पहले उन्हें अमेरिका को निवेश के लिहाज से कम आकर्षक बनाना होगा। ब्याज दरों में ज्यादा से ज्यादा कटौती करनी होगी और अपनी जीडीपी को भी गिराना होगा।

2) एक समस्या ये भी है कि एक देश तीन चीजें एक साथ नहीं कर सकता जिसे अर्थशास्त्र में असंभव त्रिमूर्ति (इम्पॉसिबल ट्रिनिटी) सिद्धांत कहते हैं। इस सिद्धांत में कहा गया है कि कोई भी देश एक साथ न तो ब्याज दरों को काबू कर सकता है न ही मुद्रा की आपूर्ति को नियंत्रित कर सकता है और न ही विनिमय दर को तय कर सकता है। किसी भी देश के लिए ऐसा करना असंभव जैसी स्थिति है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप ऐसा कर पायेंगे। उनके सामने क्या विकल्प हैं? मान लीजिए अमेरिका ब्याज दरों को नियंत्रित करता है तो डॉलर का रेट फ़्लोटिंग रहता है। अगर डॉलर को चुनता है तो ब्याज दरों पर नियंत्रण छोड़ना पड़ेगा या विदेशी निवेश पर रोक लगानी पड़ेगी जैसे चीन करता है। यानी चीन से टकराने के लिए अमेरिका को चीन बनना पड़ेगा। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि ये ऊँट किस करवट बैठेगा।

(शेयर मंथन, 19 अप्रैल 2025)

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