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सरकार का साथ बस इतना

राजीव रंजन झा

केंद्र सरकार ने अपने आर्थिक पैकेज की दूसरी किश्त का ऐलान कर दिया है और साथ ही कह दिया है कि अब हमसे मार्च तक कोई उम्मीद न रखें। व्यावहारिक रूप से इसका मतलब यह है कि अब मौजूदा सरकार से कोई उम्मीद न रखें, क्योंकि मार्च पूरा होने के बाद सरकार चुनावी आचार संहिता की डोरी में बँधी रहेगी। हालाँकि आरबीआई की ओर ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश बाकी बची रहेगी। लेकिन वास्तव में अब अगले कुछ महीनों तक आरबीआई की ओर से दरों में कोई बड़ी कमी किये जाने की उम्मीद करना बेमानी है। जैसा कि कुछ ब्रोकिंग फर्मों ने आर्थिक पैकेज और ब्याज दरों में कटौती पर जारी अपनी रिपोर्टों में कहा है, आरबीआई की ओर से दरों में कटौती का मौजूदा चक्र पूरा हो गया लगता है।


यानी अब अगले कुछ महीनों तक, या कह लें कि इस साल के शुरुआती छह महीनों में भारतीय शेयर बाजार या तो अपनी ही चाल से चलता रहेगा या फिर अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आने वाली हवाओं के साथ-साथ बहता रहेगा। बेशक घरेलू अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर आने वाली खबरों का असर हमें समय-समय पर दिखता रहेगा, लेकिन अब किसी बड़ी सरकारी पहल की उम्मीद नहीं रहेगी। यह स्थिति भारतीय बाजार को अंतरराष्ट्रीय जोखिमों के प्रति ज्यादा कमजोर बना देगी।
लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि अगर इस साल के ये शुरुआती छह महीने बिना किसी बड़ी उथल-पुथल के निकल गये, तो इसके बाद बाजार के तेजी से वापस संभलने का तर्क काफी मजबूत हो जायेगा। हालाँकि चुनाव के बाद उभरने वाली तस्वीर को लेकर कई विश्लेषक काफी सशंकित हैं। उन्हें खास तौर पर डर इस बात का है कि कहीं चुनाव के बाद कांग्रेस या बीजेपी से अलग तीसरे मोर्चे की संभावना ज्यादा मजबूत न हो जाये। लेकिन जो तीसरा मोर्चा चुनाव से महज 4-5 महीने अस्तित्व में ही नहीं नजर आ रहा, उससे डरने की इतनी क्या जरूरत है? जब भूत सामने आये, तब आप उससे भागें भी। अभी तो भूत है ही नहीं! बेशक, एक स्थिति यह बन सकती है कि एक बार फिर वाम दलों के समर्थन के बिना कोई सरकार न बन पाये। यह स्थिति कांग्रेस और वाम दल, दोनों के लिए अटपटी जरूर होगी, लेकिन राजनीति इन स्थितियों में अपना रास्ता निकाल ही लेती है।
लेकिन मेरा मानना है कि अगले छह महीनों में राजनीतिक तस्वीर कैसी बनती है, इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि अर्थव्यवस्था कौन-सी नयी करवट लेती है।

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