वैश्विक बाजारों का रुख इस समय पूरी तरह अनिश्चितता और सट्टेबाज़ी के मिश्रण से संचालित होता दिख रहा है।
बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार का कहना है कि अमेरिका का डाउ जोन्स इंडेक्स (DJS) हाल के दिनों में अपनी गिरावट को थामने की कोशिश करता नजर आया है और दोबारा 200-डे और 20-डे मूविंग एवरेज के आसपास पहुंच गया है। यह संकेत देता है कि वहां बाजार में कुछ स्थिरता लौटने की कोशिश हो रही है, लेकिन यह स्थिरता कितनी टिकाऊ है, इस पर अभी भी सवाल बने हुए हैं। बाजार में हरियाली लौटने के पीछे ठोस फंडामेंटल कारणों से ज्यादा “स्पेकुलेशन” यानी अटकलों का हाथ नजर आता है, जहां बड़े निवेशक और संस्थाएं संभावित घटनाओं, जैसे युद्धविराम (ceasefire) या राजनीतिक बयान पर पहले से दांव लगाते हैं।
अमेरिका के बाजार में यह धारणा भी बनती दिख रही है कि कुछ बड़े नेता, खासकर डोनाल्ड ट्रंप जैसे प्रभावशाली व्यक्तित्व, अपने बयानों के जरिए बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं। जब कोई नेता खुद यह कहे कि वह मार्केट को मूव कर सकता है, तो यह स्वाभाविक है कि निवेशक उसके हर बयान को गंभीरता से लें और उसी के आधार पर पोजीशन बनाएं। यही कारण है कि बाजार में अचानक बड़े मूवमेंट देखने को मिलते हैं। कभी तेजी, तो कभी गिरावट। हालांकि यह स्थिति निवेश के लिहाज से स्वस्थ नहीं मानी जाती, क्योंकि यह पारदर्शिता और स्थिरता दोनों पर सवाल खड़े करती है।
तकनीकी दृष्टिकोण से देखें तो डाउ जोन्स में 47,000 और 47,500 जैसे स्तर बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इन स्तरों के ऊपर यदि बाजार क्लोज देता है, तभी यह कहा जा सकता है कि बाजार में वास्तविक मजबूती आ रही है और निवेशकों का भरोसा लौट रहा है। उससे पहले तक किसी भी तेजी को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जा सकता। इसी तरह S&P 500 इंडेक्स में 6000 के स्तर के ऊपर हुआ ब्रेकआउट अब एक महत्वपूर्ण आधार बन चुका है, और यदि इसमें गिरावट आती है तो 5900–6000 के आसपास का थ्रोबैक सामान्य माना जाएगा। लेकिन यह गिरावट किस कारण से होगी और कितनी गहरी होगी, इसका अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है।
भारतीय बाजार पर इसका असर सीधा और एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है। अमेरिका और भारत की आर्थिक परिस्थितियां, लिक्विडिटी और निवेशकों का व्यवहार अलग-अलग है। भारत में फिलहाल दो प्रमुख कारणों से बाजार में अपेक्षित तेजी नहीं दिख रही है। पहला, पिछले कुछ वर्षों में कॉरपोरेट अर्निंग्स अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ी हैं, जिससे निवेशकों का उत्साह थोड़ा कमजोर पड़ा है। दूसरा, यह धारणा भी बन रही है कि भारतीय नीतियां अभी उतनी “फॉरेन इन्वेस्टर फ्रेंडली” नहीं हैं, खासकर लॉन्ग टर्म निवेश के नजरिए से।
विदेशी निवेशकों (FII) को भी दो हिस्सों में समझना जरूरी है। एक वे जो शॉर्ट टर्म ट्रेंड और मोमेंटम के आधार पर निवेश करते हैं, और दूसरे वे जो लंबे समय के लिए स्थिर निवेश करते हैं, जैसे सॉवरेन फंड्स। वर्तमान में जो उतार-चढ़ाव दिख रहा है, उसमें शॉर्ट टर्म निवेशकों की भूमिका ज्यादा है, क्योंकि वे तेजी से पैसा एक बाजार से निकालकर दूसरे में लगा रहे हैं। वहीं लॉन्ग टर्म निवेशक अभी भी भारत में मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव कम नजर आता है।
वैश्विक और घरेलू दोनों ही बाजारों में इस समय अनिश्चितता का माहौल है। ऐसे में नीतिगत स्थिरता, पारदर्शिता और लॉन्ग टर्म निवेश को प्रोत्साहन देने वाले कदम बेहद जरूरी हैं। अगर भारत इन क्षेत्रों में सुधार करता है, तो न केवल विदेशी निवेश बढ़ेगा बल्कि बाजार भी अधिक स्थिर और मजबूत बन सकेगा।
(शेयर मंथन, 08 अप्रैल 2026) (आप किसी भी शेयर, म्यूचुअल फंड, कमोडिटी आदि के बारे में जानकारों की सलाह पाना चाहते हैं, तो सवाल भेजने का तरीका बहुत आसान है! बस, हमारे व्हाट्सऐप्प नंबर +911147529834 पर अपने नाम और शहर के नाम के साथ अपना सवाल भेज दें।)