मौजूदा बाजार परिस्थिति में मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स की चाल काफी हद तक लार्जकैप जैसी ही दिख रही है। जिस तरह लार्जकैप शेयरों में गिरावट आई, उसी तरह मिडकैप और स्मॉलकैप में भी दबाव बना रहा।
बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार कहते है कि तीसरी तिमाही के नतीजों और वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में संभावित सुधार के संकेतों को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि चुनिंदा मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों को बेहतर सपोर्ट मिल सकता है। लेकिन यह सपोर्ट पूरे इंडेक्स में समान रूप से नहीं दिखेगा। खासकर बीएफएसआई, कंजम्प्शन, फार्मा और घरेलू मांग पर आधारित कंपनियों में अपेक्षाकृत कम गिरावट देखने को मिल सकती है, जबकि हाई पीई और हाइप आधारित सेक्टरों में दबाव ज्यादा रह सकता है।
स्मॉलकैप इंडेक्स में गिरावट का ट्रेंड पहले से ही बना हुआ है और ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो जब बाजार 5% गिरता है, तो स्मॉलकैप में 8-10% तक की गिरावट असामान्य नहीं होती। इसलिए जिन निवेशकों के पोर्टफोलियो में स्मॉलकैप का वजन अधिक है, उन्हें अस्थिरता के लिए तैयार रहना चाहिए। निवेश का मूल सिद्धांत यही है कि जितना अधिक संभावित रिटर्न, उतना ही अधिक जोखिम। जहां लार्जकैप में 15-20% रिटर्न के लिए 5-8% का जोखिम लिया जाता है, वहीं मिडकैप में 10-15% जोखिम और स्मॉलकैप में 20% तक का जोखिम सामान्य माना जाता है, क्योंकि लक्ष्य 50% से 100% तक का रिटर्न हो सकता है। यदि निवेशक स्मॉलकैप में निवेश करते समय 20% गिरावट सहन करने की मानसिक तैयारी नहीं रखते, तो उन्हें इस सेगमेंट से दूरी बनाना ही बेहतर है।
तकनीकी दृष्टि से स्मॉलकैप इंडेक्स के लिए 16,000 का स्तर महत्वपूर्ण सपोर्ट के रूप में देखा जा रहा है, जो लगभग 61.8% फिबोनाची रिट्रेसमेंट के आसपास बैठता है। यदि मौजूदा गिरावट यहीं थमती है, तो इसे मजबूत आधार माना जा सकता है। लेकिन यदि वैश्विक अनिश्चितताएं, जैसे अमेरिका-ईरान तनाव, गहराते हैं तो इंडेक्स 14,000 तक भी फिसल सकता है। हालांकि इतिहास बताता है कि युद्ध और भू-राजनीतिक तनावों के दौरान घबराकर निवेश से बाहर निकलना दीर्घकाल में अक्सर नुकसानदायक साबित होता है।
समग्र रूप से देखें तो मिडकैप और स्मॉलकैप में स्थिति चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन पूरी तरह नकारात्मक नहीं। अच्छे फंडामेंटल और बेहतर परिणाम देने वाली कंपनियां बाजार की गिरावट में भी अपेक्षाकृत स्थिर रह सकती हैं। निवेशकों को भावनात्मक निर्णय लेने के बजाय अपने जोखिम प्रोफाइल और समयावधि के अनुसार रणनीति बनानी चाहिए। अगर पोर्टफोलियो में अस्थायी गिरावट को सहन करने की क्षमता है, तो ऐसी परिस्थितियां भविष्य के बेहतर रिटर्न का आधार भी बन सकती हैं।
(शेयर मंथन, 26 फरवरी 2026)
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