राहुल जानना चाहते हैं कि उन्हें ट्रांसफॉर्मर्स एंड रेक्टिफायर्स (Transformers Rectifiers) के शेयर में आगे क्या करना चाहिए? उन्होंने 290 रुपये के आसपास खरीदा है और एक साल के नजरिए से समझना चाहते हैं। आइए, बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार से जानते हैं कि शेयरों में आगे क्या होने की संभावना है?
बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि सबसे पहले पूरे पावर सेक्टर और उसमें सप्लायर कंपनियों की भूमिका को स्पष्ट किया। उनका कहना है कि जब किसी सेक्टर में ग्रोथ आती है, तो डायरेक्ट प्लेयर्स के मुकाबले सप्लायर या इनडायरेक्ट प्लेयर्स को अक्सर ज्यादा और जल्दी फायदा मिलता है। इनडायरेक्ट प्लेयर्स का रेवेन्यू रियलाइजेशन भी अपेक्षाकृत तेज होता है, जबकि डायरेक्ट प्लेयर्स में समय लग सकता है। पावर सेक्टर में जब एक बार कैपेसिटी क्रिएट हो जाती है, उसके बाद भले ही नई कैपेसिटी का विस्तार धीमा हो जाए, फिर भी ट्रांसफॉर्मर्स जैसे प्रोडक्ट्स की जरूरत खत्म नहीं होती। नई मांग के साथ-साथ रिप्लेसमेंट, अपग्रेडेशन और एनहांसमेंट की जरूरत बनी रहती है। इस लिहाज से ट्रांसफॉर्मर्स एंड रेक्टिफायर्स इंडिया जैसी कंपनी का बिजनेस मॉडल ठीक-ठाक और टिकाऊ नजर आता है।
वैल्यूएशन के स्तर पर कंपनी करीब 30 गुना पीई पर ट्रेड कर रही है और इसके रिटर्न रेशियो भी खराब नहीं दिखते। मार्जिन्स संतोषजनक हैं और डेट का बोझ बहुत ज्यादा नहीं है। हालांकि शेयर में 390 रुपये के स्तर से जो तेज गिरावट आई, वह जरूर चिंता पैदा करती है और उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसके बावजूद मौजूदा वैल्यूएशन पर ज्यादातर डाउनसाइड निकल चुकी लगती है।
नवंबर में आई गिरावट को लेकर यह भी चर्चा हुई कि संभव है यह तिमाही नतीजों से जुड़ी निराशा का नतीजा रही हो। इसके बाद कंपनी के सीईओ मुकुंद श्रीवास्तव के इस्तीफे की खबर ने भी निवेशकों के सेंटिमेंट को प्रभावित किया। हालांकि, इसके बाद आए ताजा तिमाही नतीजे क्वार्टर-ऑन-क्वार्टर और साल-दर-साल दोनों आधार पर बेहतर रहे हैं, जिससे यह माना जा सकता है कि नेगेटिव फैक्टर काफी हद तक वैल्यूएशन में पहले ही समाहित हो चुके हैं।
सीईओ का जाना जरूर एक सेंटिमेंटल झटका होता है, लेकिन कंपनी नेतृत्वविहीन नहीं है। नए सीईओ की नियुक्ति हो चुकी है और बिजनेस के नंबर मजबूत दिख रहे हैं। ऐसे में ट्रांसफॉर्मर्स एंड रेक्टिफायर्स इंडिया को एक साल के नजरिए से देखा जाए, तो रिस्क कंट्रोल के साथ इसमें टिके रहना एक व्यावहारिक रणनीति हो सकती है।
(शेयर मंथन, 17 जनवरी 2026)
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