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भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क किसानों के हित में सुरक्षित या समझौता? एक्सपर्ट की राय

कृषि व्यापार के विशेषज्ञ विजय सरदाना कहते है कि भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में जिस अंतरिम व्यापार फ्रेमवर्क पर सहमति बनी है, उसे लेकर देश में काफी बहस चल रही है।

यह कोई अंतिम फ्री ट्रेड एग्रीमेंट नहीं है, बल्कि एक प्रारंभिक ढांचा है, जिसके आधार पर आगे विस्तृत समझौते की दिशा तय होगी। इस फ्रेमवर्क को लेकर सबसे ज्यादा चिंता कृषि क्षेत्र और किसानों के हितों को लेकर जताई जा रही है। कुछ लोग इसे भारत के लिए मजबूरी बता रहे हैं तो कुछ इसे सरकार की बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहे हैं। सच्चाई इन दोनों अतियों के बीच है। आज की जियोपॉलिटिक्स और वैश्विक आर्थिक हालात में भारत और अमेरिका दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि समझौते में दोनों पक्षों को कुछ न कुछ रियायत देनी पड़ेगी।

कृषि के संदर्भ में देखें तो भारत ने अपने मुख्य खाद्यान्न जैसे गेहूं, चावल, मक्का और चीनी को अमेरिकी आयात के लिए खोलने से इनकार किया है। ये फसलें सीधे तौर पर करोड़ों भारतीय किसानों की आजीविका से जुड़ी हैं, इसलिए इन पर कोई बड़ा समझौता करना भारत के हित में नहीं होता। वहीं दूसरी ओर, खाद्य तेल, ड्राई फ्रूट्स, कुछ फल, वाइन और व्हिस्की जैसे उत्पादों के आयात पर भारत ने नरम रुख दिखाया है। इसका कारण यह है कि भारत आज भी बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है और घरेलू उत्पादन जरूरत का एक छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है। अगर आयात पूरी तरह बंद कर दिया जाए तो महंगाई बेकाबू हो सकती है। इसलिए यहां उपभोक्ता हित और किसानों के हित के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। 


(शेयर मंथन, 10 फरवरी 2026)

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